बैंकिंग (Banking): भारत के विशेष संदर्भ में (with special reference to India)

Admin Comment: श्रीमती शालिनी जैन (कोटा) का आर्टिकल जो आरएएस (RAS), सिविल सेवा तथा राजस्थान एवं भारत की विभिन्न परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।

देश की अर्थव्यवस्था बैंकों के बिना विकसित नहीं हो सकती। आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में बैंकिंग के पहलू को देख सकते हैं। देश की बैंकिंग प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।
भारत में आधुनिक बैंकिंग की शुरूआत

  • भारत में आधुनिक बैंकिंग की शुरूआत इस देश में औपनिवेशिक काल के शुरूआत के साथ ही माना जा सकता है, जब आज से लगभग 200 साल पहले डच, अंग्रेज और फ्रांसिसी व्यापार के उद्देश्य से भारत आए.
  • चुंकि सबसे पहले अंग्रेजों का प्रभाव बंगाल में ही बढ़ा इसलिए पहला बैंक बंगाल में ही 1809 बैंक आॅफ बंगाल के नाम से खोला.
  • इसके बाद उन्होंने अपने दूसरे प्रभाव वाले क्षेत्रों बॉम्बे और मद्रास प्रसीडेंसी में 1840 में बैंक आॅफ बॉम्बे और 1843 में बैंक आॅफ मद्रास की शुरूआत की. 1857 की क्रांति के बाद जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया गया और शासन सीधे ब्रिटेन की महारानी के तहत आ गया तो इन तीन बैंकों का आपस में विलय करके इन्हें नया नाम इंपीरियल बैंक दे दिया गया.
  • यह इंपीरियल बैंक ही आजादी के बाद भारत का प्रमुख बैंक बना जिसे 1955 में नाम परिवर्तित करके भारतीय स्टेट बैंक कर दिया गया. भारत का यह सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक था.

आजादी के बाद भारत में बैंकिंग

देश के तौर पर बैंकिंग संस्थाओं को रेगुलेट करने और सरकारी मुद्रा के प्रबंधन के लिए भी भारत सरकार को एक संस्था की जरूरत महसूस हुई तो 1949 में भारतीय रिजर्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और आजादी के बाद भी केन्द्रिय बैंक के तौर पर इसकी भूमिका को यथावत रखा गया।

  • रिजर्व बैंक को भारत में बैंकिंग को रेगुलेट करने के सभी अधिकार भी दे दिए गए. इसके बाद भारत के बैंकिंग क्षेत्र में बड़ा परिवर्तन तब आया जब भारत सरकार ने 1959 में भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम के माध्यम से देश के आठ क्षेत्रीय बैंकों का राष्ट्रीय करण कर दिया और इन्हें भारतीय स्टेट बैंक का अनुषंगी बना दिया।
  • इसमें स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ इंदौर, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर और स्टेट बैंक ऑफ पटियाला प्रमुख हैं।
  • इस सफल राष्ट्रीयकरण से प्रेरित होकर भारत सरकार ने इसी तरह का एक बड़ा कदम 19 जुलाई 1969 को उठाया और देश के प्रमुख चौदह बैंकों का राष्ट्रीय करण कर दिया।
  • यह पहले से भी बड़ा कदम था इससे भारतीय बैंकों कीविश्वसनियता में इजाफा हुआ और भारतीय बैंकिंग प्रणाली मजबूत हुई।
  • इसके बाद लंबे समय के बाद 15 अप्रेल 1980 को छह निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।
  • भारतीय बैंकिंग क्षेत्र ने 1993 में उस वक्त एक बड़ी छलांग लगाई जब भाारतीय रिजर्व बैंक ने घरेलू बैंकों को बैंकिंग गतिविधियां करने की अनुमति दे दी और प्राइवेट क्षेत्र के बैंक भी अब सार्वजनिक बैंकों की तरह भारतीय जनता को अपनी सेवाएं देने लगे।

भारत में बैंकिंग के प्रकार

वैसे तो बैंकिंग के किस्मों की बात करते हुए एक बात साफ कर देनी चाहिए, कि इनके काम में इतना ज्यादा फर्क नहीं है कि आप इनके बीच अंतर की एक मोटी लाइन खींच पाएं. बल्कि बहुत महीन अंतर की वजह से इनके काम करने का तरीका बदल जाता है और ये अलग—अलग तरह के क्लाइंट्स को अपनी सेवाएं देती हैं।

निजी व सहकारी क्षेत्र के बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक ने जनवरी, सन् 1993 ई. में तेरह नये घरेलू बैंकों को बैंकिंग गतिविधियां शुरू करने की अनुमति दी। इनमें प्रमुख हैं यू.टी.आई., इण्डस इण्डिया, आई.सी.आई.सी.आई., ग्लोबल ट्रस्ट, एचडीएफसी तथा आई.डी.बी.आई.। देश में लगभग पाँच सौ सहकारी क्षेत्र के बैंक भी बैंकिंग गतिविधियों में संलग€ हैं। देशी बैंकों के साथ अमेरिकी, यूरोपीय तथा एशियायी देशों की बैंकें भी भारत में अपनी शाखायें खोलकर कारोबार कर रही हैं। इनकी शाखायें महानगरों तथा प्रमुख शहरों तक ही सीमित हैं। देश में ग्रामीण बैंकों का बड़ा संजाल फैलाया गया है। देश में लघु बैंकिंग कारोबार में इन ग्रामीण बैंकों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

भारत में बैंकिग क्षेत्र में आधुनिक सुधार

भारत में बैंकिग क्षेत्र में समय-समय पर सुधार किए जाते रहे हैं। इसके लिए सरकार ने समय-समय पर कई समितियां बनाई जिनकी रिपोर्ट में उन 14 बड़े व्यापारिक बैंको को राष्ट्रीयकरण किया गया जिनके पास 60 करोड़ रुपये थे तथा 1980 में उन 6 बैंकों को राष्ट्रीयकरण किया गया जिनके पास 200 करोड़ रुपये थेअ । उसके बाद भारत में बैंकों का महत्व और बढ़ा तथा इन बैंकों की शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में भी खोली गई। सन् 1991 में इन बैंकों में सुधार की आवश्यकता महसूस की गई। इसके लिए भारत सरकार ने अगस्त 1991 में श्री एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की तथा बाद में सन् 1998 में भी बैंकिग प्रणाली सुधार कमेटी इन्हीं की अध्यक्षता में नियुक्त की गई। वित्तीय प्रणाली की समीक्षा के लिए एम. नरसिंहम ने 1991 में निम्नलिखित सिफारिशें की—

  1. इस समिति ने तरलता अनुपात में कमी करने की सिफारिश की जिसमें कानूनी तरलता अनुपात (SLR) को अगले पांच वर्षों में 38.5 प्रतिशत से कम करके 28 प्रतिशत कर देने की सिफारिश की।
  2. इस समिति ने निर्देशित ऋण कार्यक्रमों को समाप्त करने की सिफारिश की।
  3. इस समिति के अनुसार ब्याज दरों का निर्धारण बाजार की शक्तियों के द्वारा होना चाहिए। ब्याज दरों के निर्धारण में रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
  4. इस समिति ने बैकों की लेखा प्रणाली में भी सुधार करने की बात की।
  5. इस समिति ने बैकों के ऋणों की समय पर वसूली के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर जोर दिया।
  6. नरसिंहम समिति ने बैंकों के पुनर्निर्माण के ऊपर भी जोर दिया। इस समिति के अनुसार 3 या 4 अन्तर्राष्ट्रीय बैंक, 8 या 10 राष्ट्रीय बैंक तथा कुछ स्थानीय बैंक एवं कुछ ग्रामीण बैंक एक देश के अन्दर होने चाहिए।
  7. इस समिति ने शाखा लाइसेंसिंग की समाप्ति की सिफारिश की।
  8. नरसिंहम समिति ने विदेशी बैंकिग को भी अपने देश में प्रोत्साहित करने की सिफारिश की।
  9. इस समिति ने बैंकों पर दोहरे नियंत्रण को समाप्त करने की सिफारिश की।
    पहले बैंकों पर वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक का नियंत्रण होता था। नरसिंहम कमेटी ने सुझाया कि बैंकों पर केवल रिजर्व बैंक का नियंत्रण होना चाहिए।
    1998 में गठित नरसिंहम समिति की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित हैः
  10. सुदृढ़ वाणिज्यिक बैंकों आपस में विलय अधिकतम आर्थिक और वाणिज्यिक माहौल पैदा करेगा और इससे उद्योगों का विकास होगा।
  11. सुदृढ़ वाणिज्यिक बैकों का विलय कम जोर वाणिज्यिक बैकों के साथ नहीं किया जाना चाहिए।
  12. देश के बड़े बैंकों को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए।
  13. जोखिम भरी आस्तियों से पूंजी के अनुपात को सन् 2000 तक 9 प्रतिशत तथा सन् 2002 तक 10 प्रतिशत के स्तर पर लाया जाना चाहिए।
  14. सरकारी प्रतिभूतियों द्वारा कवर किए गए असुविधाजनक हो चुके ऋणों को गैर निष्पादनीय अस्ति माना जाए।
  15. रुपये 2,00,000 लाख से कम के ऋणों पर ब्याज नियंत्रण का अधिकार बैंकों को दिया जाए।
    वर्तमान भारत में बैंकिंग
    भारत में बैंकिंग बहुत सुविधाजनक और परेशानी मुक्त है। कोई भी (व्यक्ति, समूह या जो भी हो) आसानी से लेनदेन की प्रक्रिया कर सकता हैं जब भी किसी को आवश्यकता हो। बैंकों द्वारा भारत में दी जाने वाली आम सेवाएँ इस प्रकार हैं –
    बैंक खाते: यह बैंकिंग क्षेत्र की सबसे आम सेवा है। कोई भी व्यक्ति बैंक खाता खोल सकता है जो कि बचतखाता, चालू खाता या जमा खाता कुछ भी हो सकता है।
    ऋण खाते: आप विभिन्न प्रकार के ऋणों के लिए किसी भी बैंक का रुख कर सकते हैं। यह आवास ऋण, कार ऋण, व्यक्तिगत ऋण, शेयर के विरुद्ध ऋण और शैक्षिक ऋण या कोई भी ऋण हो सकता है।
    धन हस्तांतरण: बैंकें विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में पैसा स्थानांतरण करने के लिए ड्राफ्ट, धनाआदेश या चेक जारी कर सकते है।
    क्रेडिट और डेबिट कार्ड: सभी बैंकें अपने ग्राहकों को क्रेडिट कार्ड की पेशकश करते हैं। जो कि उत्पादों और सेवाओं को खरीदने के लिये या पैसे उधार लेने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
    लाकर्स : अधिकांश बैंकों के पास लाकर्स सुविधा उपलब्ध होती है जिसमें ग्राहक अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज या क़ीमती गहने सुरक्षित रख सकता है।
    अनिवासी भारतीयों के लिए बैंकिंग सेवा
    अनिवासी भारतीयों या एनआरआई लगभग सभी भारतीय बैंकों में खाता खोल सकते हैं। अनिवासी भारतीय तीन प्रकार के खाते खोल सकते हैं:
    अनिवासी खाता (साधारण) – NRO
    अनिवासी (बाह्य) रुपया खाते – NRE
    अनिवासी (विदेशी मुद्रा) खाता – FCNR
    विभिन्न प्रकार के वाणिज्यिक बैंक
    भारत की वाणिज्यिक बैंकिंग इन श्रेणियों में रख सकते हैं-
  16. केंन्द्रीय बैंक – रिजर्व बैंक ओफ़ इंडिया भारत की केंन्द्रीय बैंक है जो कि भारत सरकार के अधीन है। इसे केन्द्रीय मंडल के द्वारा शासित किया जाता है, जिसे एक गवर्नर नियंत्रित करता है जिसे केन्द्र सरकार नियुक्त करती है। यह देश के भीतर की सभी बैंकों को संचालन के लिए दिशा निर्देश जारी करती है।
  17. सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंक –
    भारतीय स्टेट बैंक और उसके सहयोगी बैंकों को ‘स्टेट बैंक समूह’ कहा जाता है।
    राष्ट्रीयकृत बैंक
    क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक जो कि मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा प्रायोजित हैं।
    ३. निजी क्षेत्र के बैंक
    भारत में सक्रिय विदेशी बैंक
    अनुसूचित सहकारी बैंक
    गैर अनुसूचित बैंक
  18. सहकारी क्षेत्र – सहकारी क्षेत्र की बैंकें ग्रामीण लोगों के लिए बहुत अधिक उपयोगी है। इस सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित कर सकत हैं –
  19. राज्य सहकारी बैंक
  20. केन्द्रीय सहकारी बैंक
  21. प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटी
    ५. विकास बैंक / वित्तीय संस्थाएँ
    आईएफसीआई
    आईडीबीआई
    आईसीआईसीआई
    IIBI
    SCICI लिमिटेड
    नाबार्ड
    निर्यात आयात बैंक ऑफ इंडिया
    राष्ट्रीय आवास बैंक
    भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक
    पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम

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